जहाज के टर्बाइन इंजन में क्यों डाला जाता है जिंदा मुर्गा, मरा हुआ क्यों नहीं? वजह जान खुल जाएंगे दिमाग के ताले (

 जहाज के टर्बाइन इंजन में क्यों डाला जाता है जिंदा मुर्गा, मरा हुआ क्यों नहीं? वजह जान खुल जाएंगे दिमाग के ताले (500-700 शब्दों का ब्लॉग लेख)

आपने अक्सर ऐसी सनसनीखेज खबरें सुनी होंगी कि किसी विमान के इंजन में "जिंदा मुर्गा" डाला गया। सुनने में यह जितना अजीब लगता है, उतना ही रोचक और वैज्ञानिक कारण इसके पीछे छिपा है। सवाल ये उठता है कि आखिर टर्बाइन इंजन में जिंदा मुर्गा क्यों डाला जाता है? मरा हुआ क्यों नहीं? आइए, इस रहस्य से पर्दा उठाते हैं।


क्या है यह प्रक्रिया?

यह प्रक्रिया दरअसल "Bird Strike Simulation" या "Chicken Gun Test" कहलाती है। इसका इस्तेमाल विमान के टर्बाइन इंजन, विंडशील्ड और नाक (nose cone) की मजबूती को परखने के लिए किया जाता है। यह टेस्ट ये देखने के लिए किया जाता है कि क्या विमान उड़ान के दौरान किसी पक्षी से टकरा जाने पर सुरक्षित रहेगा या नहीं।


क्यों होता है बर्ड स्ट्राइक टेस्ट ज़रूरी?

जब कोई हवाई जहाज 300-800 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से उड़ रहा होता है और उस वक्त कोई पक्षी उससे टकरा जाए, तो वह पक्षी छोटा होने के बावजूद काफी नुकसान पहुंचा सकता है। पक्षियों की टक्कर से इंजन फेल हो सकता है, विंडशील्ड टूट सकती है या पूरी फ्लाइट को खतरा हो सकता है।

इसी कारण हर नए विमान के इंजन और अन्य हिस्सों की टेस्टिंग बेहद जरूरी होती है ताकि यह तय किया जा सके कि एयरक्राफ्ट रियल सिचुएशन में कितना सुरक्षित है।


जिंदा मुर्गा क्यों?

अब सवाल आता है — इंजन में जिंदा मुर्गा ही क्यों डाला जाता है?

असल में, जिंदा मुर्गा एक प्राकृतिक शरीर संरचना का प्रतिनिधित्व करता है। उसकी त्वचा, हड्डियाँ और उड़ने का तरीका — सबकुछ वैसा ही होता है जैसा हवा में उड़ते किसी पक्षी का होता है। जब इंजीनियर यह टेस्ट करते हैं, तो वे चाहते हैं कि इंजन पर वास्तविक परिस्थिति का असर देखा जा सके।

जिंदा मुर्गा हवा में जिस तरह से चलता है और उसकी मांसपेशियों में जो ऊर्जा होती है, वह मरे हुए मुर्गे में नहीं होती। मरा हुआ मुर्गा सख्त हो सकता है या फ्रीज किया गया होता है, जो रीयल-सिचुएशन को नहीं दर्शाता। इसलिए, कई परीक्षणों में जीवित या बिल्कुल ताजे मांस का इस्तेमाल किया जाता है।


लेकिन अब ये टेस्ट कैसे होते हैं?

पहले के जमाने में जिंदा मुर्गों का इस्तेमाल किया जाता था, लेकिन आधुनिक परीक्षणों में "dead but fresh" चिकन या सिंथेटिक बर्ड बॉडीज़ का उपयोग किया जाता है। इस प्रक्रिया में Compressed Air Cannon का इस्तेमाल होता है, जिससे चिकन को विमान के इंजन या विंडशील्ड पर फायर किया जाता है। इससे पता चलता है कि बर्ड स्ट्राइक की स्थिति में सिस्टम कितना दबाव झेल सकता है।


क्या यह नैतिक है?

यह सवाल भी उठता है कि क्या जिंदा जीव का इस्तेमाल करना सही है? आजकल ज्यादातर विमान निर्माता कंपनियां और लैब्स जिंदा मुर्गों की जगह मॉडल बर्ड्स, मांस के टुकड़े या सिंथेटिक टेस्ट डमीज़ का इस्तेमाल कर रही हैं। ऐसा करके वे ना केवल नैतिकता बनाए रखते हैं, बल्कि सटीक परिणाम भी हासिल करते हैं।


निष्कर्ष

जहाज के टर्बाइन इंजन में जिंदा मुर्गा डालने का कारण सिर्फ सनक या अंधविश्वास नहीं, बल्कि एक वैज्ञानिक परीक्षण होता है। इसका उद्देश्य है – एयरक्राफ्ट को बर्ड स्ट्राइक जैसे खतरों के लिए तैयार करना। हालांकि आज के आधुनिक दौर में जिंदा मुर्गों की जगह दूसरे सुरक्षित विकल्पों का उपयोग किया जा रहा है, लेकिन यह प्रक्रिया एविएशन सेफ्टी की नींव मानी जाती है।

तो अगली बार जब आप यह सुनें कि किसी इंजन में मुर्गा डाला गया, तो जानिए कि यह आपकी सुरक्षा सुनिश्चित करने की दिशा में एक वैज्ञानिक कदम है – ना कि कोई प्राचीन परंपरा या मज़ाक!

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